बांदा-बहराइच मार्ग पर मौत की तैयारी: सूखा पेड़ सड़क पर झुका, विभाग ने बोर्ड ठोककर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ा!
रायबरेली से विशेष रिपोर्ट
बांदा-बहराइच मुख्य मार्ग पर एक सूखा, सड़ा और झुका हुआ आम का पेड़ सीधे सड़क पर मौत बनकर लटक रहा है। यह दृश्य किसी आम पेड़ का नहीं, बल्कि एक संभावित जन-हत्या का है – और उससे भी ज़्यादा खतरनाक है उस पर जिम्मेदार विभाग का रवैया।
हद तो तब हो गई जब इस घातक खतरे की जानकारी मिलने के बाद संबंधित विभाग ने पेड़ काटने या हटाने के बजाय एक चेतावनी बोर्ड ठोंक दिया। उस बोर्ड पर लिखा गया – “सावधान, आगे पेड़ गिर सकता है।”
यानी अब जान जाए तो जिम्मेदार कोई नहीं – क्योंकि “बोर्ड तो पहले ही लगा दिया गया था!”
क्या सिर्फ बोर्ड लगाना ही जिम्मेदारी है?
क्या यही है प्रशासनिक संवेदनशीलता?
अगर कोई रात में उस रास्ते से गुजरे, और अंधेरे में न बोर्ड दिखे, न पेड़ – तो क्या वह व्यक्ति अपनी मौत का खुद जिम्मेदार होगा?
यह पेड़ किसी भी वक्त सड़क पर गिर सकता है। तेज़ हवा, बारिश, या सामान्य कंपन भी इसका संतुलन बिगाड़ सकते हैं। सड़क पर चल रही गाड़ियाँ, बाइक, पैदल यात्री – कोई भी इसका शिकार हो सकता है। और जब हादसा होगा, तो वही घिसी-पिटी लाइन सामने आएगी – “हमने तो पहले ही चेतावनी बोर्ड लगा दिया था।”
प्रश्न ये है कि –
क्या विभाग की जिम्मेदारी केवल चेतावनी देना भर है?
क्या पहले किसी की जान जाएगी, फिर कार्रवाई होगी?
क्या जान से ज्यादा सस्ती हो गई है सरकारी संवेदनशीलता?
यह केवल पेड़ नहीं – यह सरकारी व्यवस्था का सड़ चुका प्रतीक है।
समय रहते यदि इसे नहीं हटाया गया, तो यह साबित होगा कि हमारी व्यवस्था में सिर्फ इंतजार होता है – हादसों का, जनविरोध का, या फिर किसी निर्दोष की मौत का।
सार्वजनिक मांग:
इस जानलेवा पेड़ को तत्काल हटाया जाए।
संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय हो।
भविष्य में ऐसे मामलों में सक्रिय कार्रवाई सुनिश्चित की जाए, ताकि ‘चेतावनी’ किसी की मौत का कवर न बने।
जब प्रशासन चेतावनी के बोर्ड के पीछे छुपने लगे, तो समझ लीजिए कि खतरा केवल पेड़ का नहीं – व्यवस्था का है।
