हम और हमारी क़लम!
- पत्रकारिता कभी कमज़ोर नही रही!

(इमरान सागर की क़लम से)
पत्रकारिता कभी कमजोर नही रही यदि कमजोर होती तो हमारा देश भारत आज भी अग्रेजो का गुलाम होता! पत्रकारिता कमजोर होती तो हस्त लेखनी से आगे बढ़ कर जपानी मशीनो से छप कर समाचार पत्र जनमानस तक नही पहुंचता! पत्रकारिता कमजोर होती तो प्रिंट मीडिया की बढ़ौत्तरी न होती और न ही टेलीबिज़न का अविष्कार होता जिस पर आज इलैक्ट्रोनिक पत्रकारिता का जलबा देश में ही नही बल्कि विदेशो तक में कायम है!
पत्रकारिता अपने दमन दौर से गुजर रही है यह पूर्ण असत्य है क्यूंकि पत्रकारिता पर हर दौर में आघात ही किया जाता रहा है! आजादी संग्राम की गवाह पत्रकारिता का इतिहास देखने से मालुम होता है कि ब्रिटिश सत्ता सरकार की कुरुतियों का बिरोध पत्रकारिता पर एैसा आघात बन कर टूटा कि जहाँ पत्रकारिता के सिपाही पत्रकारो को प्रताणित कर जेल में भूखा रहने को मजबूर किया गया तो वही विभिन्न संस्थानो का पंजीकरण तक अकारण रद्द कर उन्हे बन्द कर दिया गया!
पत्रकारिता के आईने में आज भी धुंधरा सा अक्श मौजूद है कि ब्रिटिश हुक्मरान के रूप में ईस्ट इन्डिया नामक कम्पनी से भारत अपना कदम रख कर यहाँ के सिंहघासनो के साथ फरेब कर तेजी से अपने पैर जमा लिए और दबंगई के बल पर माफिया राज कायम कर लिया और भारतीयों का उत्पीड़न कर कुरितियों के जन्मदाता बन बैठे! पत्रकारिता ने जब ब्रिटिश हुकुमत की कुरितियों का बिरोध समाचार पत्रो के माध्यम से करना आरंभ किया तो जैसे हुकुमत में भूचाल आ गया! ब्रिटिश शाशन की कुरितियों के बिरोध में पत्रकारो पर कुठाराघात के स्तर से पत्रकारिता को दमन करने बड़ा प्रयास किया गया लेकिन पत्रकारिता ने जब ब्रिटिश हुकुमत की कुरितियों से लोहा लेना आरंभ किया तो उसका अन्त हुआ कि कुरितिज्ञ हुक्मरान ब्रिटिशो को आखिर देश छोड़ना पड़ा!
पत्रकारिता न जब कमज़ोर थी और न अब कमजोर है लेकिन आजादी के बाद भारतीय पत्रकारिता में राजनीति आक्रषण के बीमारो ने अपनी करनी और कथनी जैसी कुरितियों पर पर्दा डालने के प्रयास में पत्रकारिता क्षेत्र में अनविज्ञय लोगो को उतारना शुरू किया तो पत्रकारो के लिए घातक बनता चला गया! ब्रिटिश हुकुमत से देश आजादी में हर भारतीय मिल कर पत्रकारिता के साथ खड़ा था परन्तु बीते लगभग इन 7 वर्षो में देश सेवा और समाज से अनविज्ञय अपनी कुरितियों को पर्दे में रखने की गरज से पत्रकारो को अलग थलग कर उसे ब्रिटिश हुक्मरानो की तरह कुचलने का मात्र प्रयास हो सकता है! इसे अकारण नही कहा जा सकता क्यूंकि पहलुओं पर गौर करने से साफ जाहिर होता है कि यह एक बहुत बड़ी सोची समझी साजिश है! क्यूंकि पत्रकारिता का कार्य ही है कि जनमानस की विभिन्न समस्याओं को लेखनी स्तर से शासन प्रशासन तक एंव शासन प्रशासन की तमाम योजनाएं व मंशा जनमानस तक पहुंचाना और विभिन्न स्तर से समाज में फैल रही कुरितियों को जग जाहिर करना!
पत्रकारिता की मदद से देश में ईमानदारी का ढ़ोल बजबाने बाले अचानक आखिर इतने बेईमान कैसे हो सकते है कि खुद को बचाने के लिए बिना सेवा शुल्क के ईमानदारी से पत्रकारिता करने बाले पत्रकारो के जानी दुश्मन बन गये,ये चिन्तन और मंथन का विषय है परन्तु उससे पूर्व यह सोचने का विषय है कि वर्तमान परिवेष में पत्रकार कैसे सुरक्षित हो ताकि पत्रकारिता अपनी ईमानदारी पर कायम रह कर कुरितियों को वेपर्दा करती रहे! यह समझना मुश्किल हो सकता है लेकिन नामुमकिन नही कि आखिर पत्रकारो में विभीषण की भुमिका निभा कर आखिर उनकी एकजुटता को कौन भंग कर रहा है!
सबाल जहाँ तक जनपद क्षेत्र के पत्रकारो पर हो रहे लगातार हमलो और झूठे मुकदमो का है तो समझा जा सकता है कि जहाँ एकजुट होने के लिए जनपद भर में पत्रकारो ने एकजुटता न रखते हुए विभिन्न संगठनो का निर्माण जरूर कर लिया परन्तु पत्रकारो की विभिन्न समस्याओं के निस्तारण में जनपद भर में एक ही संगठन माध्यम बना क्यूंकि उसने जनपद नगर से अधिक ग्रामीण अचल के पत्रकारो को एकजुट किया जहाँ छुटभैय्ये राजनीतिज्ञ एंव माफिया राज के चलते पत्रकारो के साथ अधिक समस्याएं रही!
बिचार है कि जनपद नगर या ग्रामीण अचलो में पत्रकारो पर जानलेवा हमले और झूठे मुकदमों के स्तर से पत्रकारिता पर होने बाले कुठाराघात को रोकने के लिए ग्रामीण अचल जैसे पत्रकारो के मजबूत संगठन के साथ मिल कर पत्रकारो को एक जुट होकर जनपद क्षेत्र की तमाम कुरितियो से लड़ते हुएे शासन प्रशासन से अपनी सुरक्षा अब मांगने की जरूरत नही बल्कि छीन लेनी चाहिए क्यूंकि इस बदलते परिवेष में जहँ हक पाने के लिए सभी छीनने को प्रयासरत हो तो वहाँ पत्रकारो को भी पीछे न रहते हुए तेजी के साथ सबसे आगे पहुंचना होगा क्यूंकि समय फिर एक बार ब्रिटिश हुकुमत की तरह अपना इतिहास दोहराता नज़र आ रहा है!
