- चीकू सिर्फ फल ही नही, पेड़ पत्तो सहित एक औषधि है!

(CRS इमरान सागर की क़लम से)
शाहजहाँपुर/तिलहर-चीकू एक ऐसा फल है जो दिखने में आलू के जैसा लगता है, लेकिन स्वाद से भरपूर होता है! चीकू की मिठास और दानेदार स्वाद लोगों को खूब पसंद आता है! कहीं कहीं चीकू को लोग सपोटा के नाम से भी जानते हैं! चीकू खाने से शरीर को तुरंत एनर्जी मिलती है! इसके सेवन से कमजोरी दूर होती है और स्वास्थ्य को कई फायदे मिलते हैं! चीकू सिर्फ फल ही नहीं बल्कि इसका पेड और पत्तों का इस्तेमाल कई बीमारियों को दूर करने में किया जाता है! चीकू पोषक तत्वों से भरपूर है है, चीकू में विटामिन-बी, सी, ई और पोटैशियम, मैंगनीज, कैल्शियम, मैग्नीशियम, फाइबर और एंटी-ऑक्सीडेंट गुण अच्छी मात्रा में पाए जाते हैं! कई आयुर्वेदिक दवाओं में चीकू के पत्ते, जड़ और छाल का उपयोग किया जाता है! चीकू खाने से कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का खतरा भी कम होता है! वजन घटाने वालों के लिए भी चीकू अच्छा फल है! पेट के लिए भी चीकू बहुत फायदेमंद है!
अहमद बाग की तरह,चीकू का बाग भी अब प्राचीन बागो की सूचि में आ गया समझो लेकिन, विडम्वना यह कि आम का अहमद बाग तिलहर की सर ज़मी से ज़मीदोज़ कर भू-खंण्ड और खेती का रूप ले चुका है! चीकू का एक बाग तिलहर नगर के मोहल्ला नितगंजा में है और दूसरा बाग कहीं भख्सी नाले के किनारे मौजूद है! मै अपने जीवन में आज पहली बार नगर के अन्दर, मोहल्ला नितगंजा में स्थित चीकू के बाग पहली बार घुसा! हालांकि पिछले दस सालो में इस बाग का चीकू कई बार खा चुका हूँ, और, और जगह के चीकू के मुकाबले यह अधिक मीठा है जबकि साईज़ में जरा सा छोटा जरुर है!
बताते हैं इस चीकू बाग के स्वामी काफी समय से बम्बई (अब मुम्बई) में रहते हैं और यहाँ पर स्थाई रूप से बाग का रखरखाब और फसल के लिए किसी को दे रखा है! बागबानी के कारण चीके के पेड़ अधिक पुराने तो नही लगते लेकिन फिर इन चीकू के पेड़ो को जैसी खिदमत फसल के लिए चाहिए बैसी तो शायद उन्हे नही मिल पा रही है हाँ जिस बक्त मै अन्दर घुसा तो बाग में चीकू के हर पेड़ की क्यारी में पानी जरुर भरा नज़र आया जो कि इस गर्मी में जरुरी है! चीकू के इन मात्र दो बागो को बचाने और उन्हे बरकरार रखने के लिए काफी मेहनत की जरुरत है क्यूंकि बागो पर मेहनत न होने की बजह से तिलहर नगर में बेरी और आम के बागो के पेड़ पूरी तरह बीमार होकर नष्ट क्या होने लगे कि जमीन बेच कर अकूत धन कमाई के लालच में बागो को काट कर खत्म करके मानसून को पूरी तरह नाराज़ कर दिया गया!
तिलहर की सर ज़मी पर जब आम के बागानो की बात आती तो आम के कई बागो में आम की फसल के साथ अनेको मनोहरी दृश्य घूम जाते हैं! कोतवाली के सामने किले वाला बाग और उसके साथ में बाबा नन्द क्रेशर के सामने आम का बाग(रेंनसा स्कूल जो पहले नही था के बग़ल में! खैरपुर रोड पर थोड़ा आगे बढ़ो तो कांटो वाला बांग के नाम से मशहूर बाग से पीछे की ओर लगा अमरूद का खूबसूरत बाग भी भुलाया नही जा सकता! चंद रुपयो की लालच में लकड़कट्टो की कुल्हाड़ी इन बागो पर एैसी चली कि भले ही आवादी बसाने के लिए भूखंण्डो पर इमारते बन रही हो लेकिन रौनक नाम की रत्ती भर कोई चीज़ नज़र नही आती और यह सब अधिक समय बीतने पर नही बल्कि 1992 के बाद से काफी तेजी से घटा!
1992 से आज 2022 तक लगभग 30 सालो तिलहर का भूगोल बदलने में अहम भुमिका निभाने के बाद तिलहर के इतिहास की जानकारी मांगने को सिर्फ मूर्खता का ही नाम दिया जा सकता है! इन 30 सालो तिलहर नगर के हरे भरे बागो को लुप्त कराने में कहाँ, किसने, कैसी भूमिका निभाई, यह शायद ही किसी से छिपा हो लेकिन जुवाँ पर न आए यह दूसरी बात है!
बहुत सुंदर यथार्थ को दर्शाता लेख पर्यावरण को दूषित करते लालची लोग विलुप्त होते बाग झाड़ उजाड़ से लगते शहर चारों ओर विरानी सी दिखाई पड़ती यह है आज का परिदृश्य जो हमें रोगी ही नहीं बना रहा हमारी जीवन अवधि भी बहुत कम कर रहा है ऐसा नहीं है कि हम सब जानते नहीं हैं सब कुछ जानने के बाद भी चंद पैसों के लालच में अंजान बने बैठे हैं और अपनी भावी पीढ़ी के सामने मौत का कुआं खोदने पर आमादा है